पशुओं को लगवाएं शीतलता रोगों के टीके

सर्दी के बचाव के लिए पशुधन का प्रबंधन ठीक ढंग से करें। इसमें हवा के आवागमन और वर्षा से बचाव का भी साधन होना चाहिए। पशुओं का बिछावन सूखा होना चाहिए और इसे समय-समय पर बदलते रहना चाहिए।

इस मौसम में भैंसें नए दूध होती हैं। ब्याने के डेढ़-दो माह बाद भैंस में गरमी के लक्षण (मदकाल) दिखाई देने चाहिए। भैंस में गरमी आने के बाद अंतिम आठ-दस घंटों में एक अच्छे झोटे से मिलवाना चाहिए या निकट के कृत्रिम गर्भाधान केंद्र से नए दूध करवाना चाहिए। यदि भैंस गरमी में न आती हो तो उसे पशु चिकित्सक को दिखाएं। नियमित रूप से भैंस को गरमी में आने के लिए यह आवश्यक है कि उसको संतुलित आहार व 30-50 ग्राम खनिज मिश्रण प्रतिदिन खिलाएं। भैंसें अधिकतर रात को या सुबह के समय गरमी के लक्षण दिखाती हैं। जब ये गरमी में आती हैं तो बार-बार पेशाब करती हैं और बोलती हैं, चारा कम खाती हैं और दूध की मात्रा भी घट जाती है। इसके अतिरिक्त कुछ बेचैनी के लक्षण भी दिखाती है। कई भैंसों में गरमी की पहचान बहुत कठिनाई से होती है क्योंकि इनकी गरमी गूंगी रहती है। यदि नसबंदी कराया हुआ झोटा भैंसों के समूह में छोड़ दिया जाए तो गरमी में आई भैंसों की आसानी से पहचान की जा सकती है और इससे आप ठीक समय पर अपनी भैंस का प्रजनन करा सकते हैं।

गाय-भैंस को शीलता रोग (रिंडरपेस्ट) का टीका लगवा लें। मुंह व खुरपका बीमारी से बचाव का टीका भी लगवाएं।

अपने पशुओं को कृमिनाशक दवाइयां पशु चिकित्सक की सलाह से पिलाएं। यदि पशुओं को कृमिहीन न किया जाए तो उनमें दूध देने की क्षमता और विकास घट जाता है।

यदि बरसीम के साथ सूखा चारा न दिया जाए और बरसमी गीली हो तो पशुओं के पेट में गैस के कारण अफारा आ सकता है। इससे बचने के लिए पशुओं के वजन के हिसाब से दो प्रतिशत सूखे चारे आहार में अवश्य प्राप्त होने चाहिएं। यदि अफारा आ जाए तो पशु को एक छटांक तारपीन का तेल, आधा सेर सरसों या अलसी के कच्चे तेल में मिलाकर देने से अफारा ठीक हो जाता है। गाय-भैंस का दूध थन को अंगुलियों और अंगूठे के बीच दबाकर न निकालें। पूरे हाथ से ही दूध निकालें। यह गोबर पतला हो जाए तो तुरंत अपने पशु चिकित्सक से सलाह दें।

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