साहिर लुधियानवी की यह नज़्म आज यूक्रेन-रूस युद्ध के माहौल में भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी कि पहले कभी किसी युद्ध के समय लिखी गई है। यह भी ध्यान अनायास ही कौंध जाता है कि कहीं यूक्रेन की मदद पर नाटो देश या अमेरिका कूद पड़ता और हमले मास्को में ही होते तो क्या मास्को के रैड स्क्वायर या टालस्टाय, चेखक व तुर्गमेव सरीखे साहित्यकारों के स्मारक बच पाते?
यह युद्ध एक महाबली और एक ऐसे छोटे देश के बीच है जिसे उम्मीद थी कि हमला हुआ तो रूस के विरोधी महाबली उसकी मदद करेंगे। मगर इतिहास यह गवाही भी देता है कि पराई आग में कोई भी अपने हाथ नहीं जलाता। महाबली रूस को आशंका थी कि यदि यूके्रन में धीरे-धीरे अमेरिका व नाटो-देशों के करीब सरकने की कोशिश जारी रहने दी गईं तो ये देश रूस की सीमाओं तक सरक आएंगे।
एक केजीबी जासूस के रूप में अपनी जि़ंद$गी आरंभ करने वाले रूसी राष्ट्रपति पुतिन को मालूम है कि अगर अमेरिका और अन्य नाटो देशों को अपने करीब अड्डे बनाने दिए तो रूस की प्रभुसत्ता पर $खतरे मंडराने लगेंगे। ऐसा नहीं कि रूस-यूके्रन युद्ध की आग में सि$र्फ दोनों देश ही सुलग रहे हैं। हकीकत यह है कि हज़ारों किलोमीटर दूर स्थित हमारे अपने देश तक भी इस आग को सेंक रहा है।
भारतीय स्टेट बैंक समूह की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत को रूस और यूक्रेन के बीच घमासान से कच्चे तेल के बाजार में उफान के चलते 95 हजार करोड़ रुपए से एक लाख करोड़ रुपए के राजस्व की हानि हो सकती है। स्टेट बैंक समूह के मुख्य आर्थिक सलाहकार सौम्या कांति घोष की निगरानी में तैयार एसबीआई अनुसंधान रिपोर्ट में कहा गया है कि यूके्रन-रूस लड़ाई का परिणाम कुछ भी हो, पर इसका असर पूरे देश और संपत्ति बाज़ार पर पड़ेगा।
रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख किया गया है कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का भाव 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच चुका है। इसके अलावा कीमती धातुओं और सोने तथा पेलेडियम और प्लेटिनियम जैसी धातुओं में भी तेजी आएगी। एसबीआई अनुसंधान रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम में उछाल के बाद भारत में डीजल-पेटोल दाम बढऩे से रोकने के लिए उत्पाद शुल्क घटाती है तो उसे हर महीने इस मद में आठ हजार करोड़ रुपए के राजस्व का नुकसान होगा।
रूस की सीमाएं जिन-जिन देशों से मिलती हैं-
उनमें नार्वे, फिनलैंड, एस्टोनिया, लाटविया, लिथुआनिया, पोलैंड, बेलारूस, यूक्रेन, जॉर्जिया, अजरबैजान, कजाकिस्तान, चीन, मंगोलिया, उत्तर कोरिया, संयुक्त राज्य अमेरिका (समुद्री) और जापान (समुद्री) हैं।
ऐसे किसी भयावह संदर्भ में ही साहिर लुधियानवी ने दशकों पहले लिख डाला था-
खून अपना हो या पराया हो
नस्ल ए आदम का खून है आखिर
जंग मशरिक में हो कि मग़रिब में
अम्न-ए-आलम का ख़ून है आखिर
बम घरों पर गिरें कि सरहद पर
रूह ए तामीर ज़ख्म खाती है
खेत अपने जलें कि औरों के
ज़ीस्त फ्राकों से तिलमिलाती है
टैंक आगे बढ़ें कि पीछे हटें
कोख धरती की बाँझ होती है
$फतह का जश्न हो कि हार का सोग
जि़ंदगी मय्यतों पे रोती है
जंग तो खुद ही एक मसला है
जंग क्या मसअलों का हल देगी
आग और ख़ून आज बख़्शेगी
भूख और एहतियाज कल देगी
इसलिए ऐ शरी$फ इंसानो
जंग टलती रहे तो बेहतर है
आप और हम सभी के आँगन में
शम्मअ जलती रहे तो बेहतर है
नस्ल ए आदम का खून है आखिर
जंग मशरिक में हो कि मग़रिब में
अम्न-ए-आलम का ख़ून है आखिर
बम घरों पर गिरें कि सरहद पर
रूह ए तामीर ज़ख्म खाती है
खेत अपने जलें कि औरों के
ज़ीस्त फ्राकों से तिलमिलाती है
टैंक आगे बढ़ें कि पीछे हटें
कोख धरती की बाँझ होती है
$फतह का जश्न हो कि हार का सोग
जि़ंदगी मय्यतों पे रोती है
जंग तो खुद ही एक मसला है
जंग क्या मसअलों का हल देगी
आग और ख़ून आज बख़्शेगी
भूख और एहतियाज कल देगी
इसलिए ऐ शरी$फ इंसानो
जंग टलती रहे तो बेहतर है
आप और हम सभी के आँगन में
शम्मअ जलती रहे तो बेहतर है
आखिर रूस ने क्यों यूक्रेन पर क्यों किया हमला, क्या है इसके पीछे पुतिन की मंशा
रूस का यूक्रेन से एक भावनात्मक रिश्ता रहा है बावजूद इसके कि वो एक स्वतंत्र राष्ट्र है। सोवियत संघ के विघटन के दौरान जो देश रूस से अलग हुए थे उनमें एक यूक्रेन भी था। आज दोनों के बीच युद्ध की स्थिति है।
पूरी दुनिया की नजरें इन दोनों देशों के अलावा यूरोप और अमेरिका पर भी लगी हुई हैं। दरअसल, रूस के विघटन के बाद जो देश अलग हुए थे उनमें यूक्रेन भी एक था। रूस के साथ में उस वक्त क्रीमिया भी था जिसको वर्ष 2014 में रूस ने आज़ाद कर अपने नियंत्रण में ले लिया था। इसके अलावा यूक्रेन के डोनबास, लुहांस्क और डोनेस्तक में रूसी समर्थक बहुसंख्यक हैं। यूक्रेन के बाहर की बात करें तो बेलारूस, जार्जिया पूरी तरह से रूस के साथ हैं। यूक्रेन रूस से पूरी तरह से घिरा हुआ है। उन कारणों की बात करते हैं जिसकी वजह से रूस को यूके्रन पर हमले का कदम उठाना पड़ा है।
इसकी सबसे बड़ी वजह अमेरिका द्वारा यूक्रेन को नाटो संगठन में शामिल करने की कवायद है। अमेरिका के वर्चस्व वाले इस संगठन में 30 देश शामिल हैं जिनमें से अधिकतर यूरोप के ही हैं। हालांकि इसमें सबसे अधिक जवान अमेरिका के ही हैं। रूस पर दबाव बनाने और अपने पुराने विवादों के कारण अमेरिका लगातार इस तरह की कवायद करता रहा है। अमेरिका पहले से ही रूस पर प्रतिबंध लगाकर उसको दबाव में लाने की कवायद कर चुका है। हालांकि उसकी ये चाल अब तक काम नहीं आई थी। अब वो यूक्रेन के सहारे इस काम को करना चाहता है। रूस की चिंता ये है कि यदि यूक्रेन नाटो के साथ चला जाता है तो उसकी सेना और उसके हथियारों के दम पर अमेरिका उसको नुकसान पहुंचाने में आशिंक रूप से सफल हो सकता है।
इस हमले की दूसरी वजह अमेरिका और पश्चिमी-यूरोपीय देशों का नार्ड स्ट्रीम-2 पाइपलाइन पर रोक लगाना भी शामिल है। रूस ने इस परियोजना पर अरबों डालर का खर्च किया है। रूस इसके जरिये फ्रांस, जर्मनी समेत समूचे यूरोप में गैस और तेल की सप्लाई करना चाहता है। इससे पहले ये सप्लाई जिस पाइपलाइन के जरिए होती थी वो यूक्रेन से जाती थी। इसके लिए रूस हर वर्ष लाखों डालर यूक्रेन को अदा करता था। नई पाइपलाइन के बन जाने से यूक्रेन की कमाई खत्म हो जाएगी। यूक्रेन के रूस से अलगाव की एक बड़ी वजह में ये भी शामिल है।
तीसरी वजह ये है कि रूस नहीं चाहता है यूक्रेन किसी भी तरह से अमेरिका के साथ जाए। इसकी एक बड़ी वजह ये भी है कि रूस का यूक्रेन से भावनात्मक रिश्ता है। रूस की नींव यूक्रेन की धरती से ही रखी गई थी। रूस की पहचान यूराल पर्वतशृंखला भी यूक्रेन से ही होकर गुजरती है।
साभार: डा. चन्द्र त्रिखा
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